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Forest Conservation India: विकास की कीमत जंगल ही क्यों चुकाएं?

छत्तीसगढ़ और ओडिशा में खनन परियोजनाओं के लिए हजारों हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन और लाखों पेड़ों की संभावित कटाई ने विकास बनाम पर्यावरण की बहस को फिर तेज कर दिया है। सवाल यह है कि क्या आर्थिक विकास की कीमत हर बार जंगल, वन्यजीव और आदिवासी समुदाय ही चुकाएंगे, या भारत ऐसा संतुलित विकास मॉडल अपनाएगा जिसमें पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक प्रगति साथ-साथ चलें।

News Media Admin Jul 22, 2026 3 min read
Forest Conservation India: विकास की कीमत जंगल ही क्यों चुकाएं?
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New Delhi: भारत जैसे विकासशील देश के लिए ऊर्जा, उद्योग, रोजगार और बुनियादी ढांचे का विस्तार अनिवार्य है। लेकिन जब विकास की हर बड़ी परियोजना की कीमत जंगल, वन्यजीव और आदिवासी समुदाय चुकाने लगें, तब यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय न्याय का प्रश्न बन जाता है।

हाल ही में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की अधिकार प्राप्त समिति ने छत्तीसगढ़ और ओडिशा में खनन परियोजनाओं के लिए लगभग दो हजार हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन को सैद्धांतिक मंजूरी देने की सिफारिश की है। तीन प्रमुख कोयला परियोजनाओं के लिए 1,737 हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग प्रस्तावित है, जबकि केवल ओडिशा की अलकनंदा कोल माइंस परियोजना में ही 3.30 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई की संभावना जताई गई है।

सरकार का तर्क है कि यह केवल स्टेज-1 की मंजूरी है और अंतिम स्वीकृति से पहले सभी पर्यावरणीय शर्तों का पालन किया जाएगा। क्षतिपूरक वनीकरण होगा, वन्यजीव प्रबंधन योजनाएं लागू होंगी और पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई की जाएगी। लेकिन मूल सवाल यह है कि क्या दशकों में विकसित हुए एक प्राकृतिक जंगल की भरपाई केवल नए पौधे लगाकर संभव है?

जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते। वे मिट्टी, जल स्रोतों, जैव विविधता, वन्यजीवों और स्थानीय समुदायों का जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र हैं। एक परिपक्व जंगल को नष्ट कर कहीं और पौधे लगा देना उस पारिस्थितिक संतुलन को वापस नहीं ला सकता, जो वर्षों में विकसित होता है।

इन परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव भी गंभीर हैं। सरकारी दस्तावेज स्वयं स्वीकार करते हैं कि प्रस्तावित क्षेत्रों में हाथी, पैंगोलिन, स्लॉथ भालू और अन्य वन्यजीवों की मौजूदगी या आवाजाही है। कई क्षेत्रों में भले ही आधिकारिक हाथी गलियारे चिन्हित न हों, लेकिन वन्यजीव अपने प्राकृतिक मार्ग सरकारी नक्शों के अनुसार तय नहीं करते। जब खनन के लिए जंगलों का स्वरूप बदलता है, तो मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने का खतरा भी बढ़ जाता है।

इस पूरी बहस का सबसे संवेदनशील पक्ष आदिवासी और वन-आश्रित समुदाय हैं। उनके लिए जंगल केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और पहचान का आधार हैं। भूमि अधिग्रहण और आर्थिक मुआवजा उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक क्षति की भरपाई नहीं कर सकते। पुनर्वास केवल मकान देने का नाम नहीं, बल्कि जीवन की पूरी व्यवस्था को पुनर्स्थापित करने का प्रश्न है।

हसदेव अरण्य जैसे उदाहरण पहले ही यह दिखा चुके हैं कि कोयले की आवश्यकता के नाम पर बड़े पैमाने पर वन भूमि का डायवर्जन किस तरह स्थानीय विरोध और पर्यावरणीय चिंताओं को जन्म देता है। सरकारें यह कह सकती हैं कि पेड़ों की कटाई चरणबद्ध होगी, लेकिन पर्यावरणीय नुकसान की प्रकृति समय से नहीं बदलती। एक लाख पेड़ एक साथ काटे जाएं या दस वर्षों में, अंततः नुकसान जंगल का ही होता है।

सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि एक ओर भारत जलवायु परिवर्तन से लड़ने, कार्बन उत्सर्जन घटाने और हरित ऊर्जा को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता दोहराता है, वहीं दूसरी ओर बढ़ती ऊर्जा मांग के लिए लगातार नए कोयला खनन क्षेत्रों को मंजूरी दी जा रही है। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ऊर्जा नीति और पर्यावरण नीति एक-दूसरे के साथ संतुलन बनाकर चल रही हैं?

विकास का विरोध नहीं किया जा सकता। देश को बिजली चाहिए, उद्योगों को खनिज चाहिए और रोजगार भी आवश्यक हैं। लेकिन विकास का मॉडल ऐसा होना चाहिए जिसमें आर्थिक लाभ और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चलें। परियोजनाओं की आर्थिक लागत का विस्तृत आकलन किया जाता है, लेकिन जंगलों के नष्ट होने, भूजल पर प्रभाव, जैव विविधता की क्षति और विस्थापित समुदायों की सामाजिक कीमत का वास्तविक मूल्यांकन आज भी अधूरा है।

अब समय आ गया है कि विकास को केवल उत्पादन, राजस्व और जीडीपी के आंकड़ों से नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और सामाजिक न्याय के पैमाने पर भी मापा जाए। यदि वन भूमि का डायवर्जन अपरिहार्य है, तो सरकार को पूरी पारदर्शिता के साथ यह बताना चाहिए कि उसकी पर्यावरणीय और सामाजिक लागत क्या होगी और उसकी भरपाई कैसे की जाएगी।

क्योंकि विकास का वास्तविक अर्थ केवल आज की आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित जंगल, स्वच्छ नदियां, समृद्ध जैव विविधता और सम्मानजनक जीवन भी है।

आखिर सवाल यही है—क्या विकास की कीमत हर बार जंगल, वन्यजीव और आदिवासी समुदाय ही चुकाते रहेंगे, या अब विकास और पर्यावरण के बीच न्यायपूर्ण संतुलन स्थापित करने का समय आ गया है?

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