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New Rules: भांग की खेती के नए नियम: किसानों को प्रति बीघा 3 लाख और कंपनियों को 2 करोड़ का लाइसेंस शुल्क

हिमाचल प्रदेश सरकार ने मेडिकल भांग की नियंत्रित खेती और उससे जुड़े उद्योगों के लिए विस्तृत लाइसेंस शुल्क और नियामक व्यवस्था तय की है। किसानों को प्रति बीघा 3 लाख रुपये और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट को 2 करोड़ रुपये वार्षिक लाइसेंस शुल्क देना होगा। राज्य और जिला स्तर पर समितियां खेती, भंडारण, परिवहन और प्रसंस्करण की निगरानी करेंगी।

News Media Admin Jul 22, 2026 2 min read
New Rules: भांग की खेती के नए नियम: किसानों को प्रति बीघा 3 लाख और कंपनियों को 2 करोड़ का लाइसेंस शुल्क
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Shimla: हिमाचल प्रदेश सरकार ने मेडिकल भांग (मेडिसिनल कैनाबिस) की नियंत्रित खेती और उससे जुड़े उद्योगों के संचालन के लिए विस्तृत नियामक ढांचा तैयार कर लिया है। नई व्यवस्था के तहत मेडिकल उपयोग के लिए भांग की खेती करने वाले किसानों को प्रति बीघा तीन लाख रुपये वार्षिक लाइसेंस शुल्क देना होगा। वहीं, भांग आधारित औषधियों, अर्क और अन्य अनुमोदित उत्पादों के निर्माण के लिए स्थापित होने वाली मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों को दो करोड़ रुपये का वार्षिक लाइसेंस शुल्क अदा करना होगा। इस नीति के लागू होने के साथ ही हिमाचल प्रदेश मेडिकल भांग की नियंत्रित खेती को वैधानिक रूप से अपनाने वाला देश का पहला राज्य बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

सरकार ने स्पष्ट किया है कि भांग की खेती केवल औषधीय, वैज्ञानिक अनुसंधान और औद्योगिक उपयोग तक सीमित रहेगी। इसके किसी भी प्रकार के नशीले या अवैध उपयोग की अनुमति नहीं होगी। खेती से लेकर भंडारण, परिवहन, प्रसंस्करण और तैयार उत्पादों के विपणन तक हर चरण पर सख्त निगरानी रखी जाएगी ताकि किसी भी प्रकार के दुरुपयोग की संभावना को रोका जा सके।

नई नीति के अनुसार मेडिकल भांग की खेती करने के इच्छुक किसानों को कल्टीवेटर लाइसेंस लेना अनिवार्य होगा। इसके लिए प्रति बीघा तीन लाख रुपये वार्षिक शुल्क निर्धारित किया गया है। लाइसेंस के नवीनीकरण के समय भी समान शुल्क देना होगा। वहीं, जो कंपनियां एक ही परिसर में खेती और मैन्युफैक्चरिंग दोनों गतिविधियां संचालित करेंगी, उन्हें मैन्युफैक्चरर कल्टीवेशन लाइसेंस लेना होगा। इसके लिए प्रति बीघा 10 लाख रुपये का वार्षिक शुल्क निर्धारित किया गया है।

भांग आधारित औषधीय उत्पादों, अर्क, एक्सट्रैक्ट और अन्य स्वीकृत वस्तुओं के निर्माण के लिए अलग से मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस लेना अनिवार्य होगा। इस लाइसेंस के लिए दो करोड़ रुपये वार्षिक शुल्क तय किया गया है और इसके नवीनीकरण पर भी समान राशि देनी होगी। सरकार का मानना है कि इस व्यवस्था से राज्य में नियंत्रित और पारदर्शी औद्योगिक निवेश को बढ़ावा मिलेगा।

मेडिकल भांग परियोजना के प्रभावी संचालन और निगरानी के लिए राज्य स्तरीय समीक्षा समिति का गठन किया जाएगा। इसकी अध्यक्षता राज्य कर एवं आबकारी विभाग के प्रशासनिक सचिव करेंगे। समिति में कृषि, उद्योग, राजस्व, बागवानी, आयुष, कृषि विश्वविद्यालय, ड्रग कंट्रोल विभाग तथा एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाएगा। यह समिति लाइसेंस जारी करने, बीज बैंक विकसित करने, अनुसंधान को प्रोत्साहित करने और उद्योग स्थापना से जुड़े मामलों में सिंगल विंडो प्लेटफॉर्म के रूप में कार्य करेगी।

जिला स्तर पर भी निगरानी के लिए उपायुक्त की अध्यक्षता में समितियां गठित की जाएंगी। इनमें पुलिस अधीक्षक, कृषि, आबकारी, वन, ड्रग कंट्रोल तथा आयुर्वेद विभाग के अधिकारी शामिल होंगे। ये समितियां खेती वाले क्षेत्रों का नियमित निरीक्षण करेंगी और लाइसेंसधारकों की गतिविधियों पर नजर रखेंगी। साथ ही यह सुनिश्चित करेंगी कि भांग की खेती पूरी तरह सरकार द्वारा निर्धारित नियमों के अनुरूप ही हो।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसान अपनी उपज केवल अधिकृत वेयरहाउस या लाइसेंस प्राप्त मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों तक ही पहुंचा सकेंगे। इसके लिए ट्रांसपोर्ट परमिट और वैध पास लेना अनिवार्य होगा। सरकार का उद्देश्य मेडिकल भांग की खेती के माध्यम से औषधीय उद्योग को बढ़ावा देना, किसानों के लिए आय के नए अवसर पैदा करना और राज्य में नियंत्रित निवेश को आकर्षित करना है, जबकि अवैध उपयोग और तस्करी पर पूरी तरह रोक बनाए रखना भी इस नीति की प्रमुख प्राथमिकता रहेगी।

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