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सड़कें बनती रहीं, शिक्षा का बजट घटता रहा

News Media Admin Jul 24, 2026 2 min read
सड़कें बनती रहीं, शिक्षा का बजट घटता रहा
Photograph for NEW MEDIA KIRAN

New Delhi: "देश का भविष्य युवा हैं" - यह लाइन हर सरकार बोलती है। प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक हर मंच पर यही कहा जाता है। लेकिन जब बजट आता है तो प्राथमिकताएं बदल जाती हैं।

बजट में शिक्षा पीछे, सड़कें आगे

पिछले 12 सालों में शिक्षा पर सरकारी खर्च की हिस्सेदारी लगातार घटी है। इतिहासकार `रामचंद्र गुहा` ने भी इसी पर सवाल उठाए हैं। उनकी टिप्पणी ऐसे समय आई है जब राजधानी में शिक्षा और युवाओं को लेकर आंदोलन चल रहा है।

सवाल सड़कों का विरोध नहीं है। सड़कें, पुल, एक्सप्रेसवे विकास के लिए जरूरी हैं। सवाल यह है कि `क्या विकास का मतलब सिर्फ बुनियादी ढांचा रह गया है?`

सड़क का उद्घाटन हो सकता है, फोटो खिंच सकती है, राजनीतिक लाभ मिल सकता है। शिक्षा का नतीजा 10-15 साल बाद दिखता है। शायद इसलिए राजनीति को सड़क ज्यादा "आकर्षक" लगती है।

युवाओं की बेचैनी: पेपर लीक से बेरोजगारी तक

आज का युवा सिर्फ बेरोजगारी से नहीं जूझ रहा।

1. प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितता और पेपर लीक

2. रिजल्ट में देरी

3. विश्वविद्यालयों में खाली शिक्षक पद

4. महंगी होती शिक्षा

लाखों छात्र और परिवार सालों की मेहनत और जमा पूंजी दांव पर लगाते हैं। जब सिस्टम ही भरोसे लायक न रहे तो सवाल उठना लाजमी है।

`सीजेपी के नेतृत्व में चल रहा आंदोलन` इसी बेचैनी का नतीजा है। सरकार इसे "राजनीतिक" कहकर टाल सकती है, लेकिन सवाल खत्म नहीं होंगे - `भविष्य से खिलवाड़ क्यों? जिम्मेदारों पर कार्रवाई कब? शिक्षा की जगह दूसरी परियोजनाएं प्राथमिकता क्यों?`

आंदोलन दब सकता है, सवाल नहीं

सबसे खतरनाक बात: जब युवा सवाल पूछता है तो सरकार जवाब की जगह उसे कंट्रोल करने लगती है। पुलिस से प्रदर्शन रोका जा सकता है, लेकिन उस युवा के मन में उठे सवाल को नहीं रोका जा सकता जो अपनी मेहनत और भविष्य को व्यवस्था की लापरवाही की कीमत चुकता देख रहा है।

शिक्षा सिर्फ शिक्षा मंत्रालय का मुद्दा नहीं

लेखक का साफ मत है - शिक्षा का संकट देश की `अर्थव्यवस्था, रोजगार, सामाजिक न्याय और लोकतंत्र` से जुड़ा है।

कमजोर शिक्षा = कमजोर अर्थव्यवस्था

कमजोर विश्वविद्यालय = ज्ञान आधारित दुनिया में नेतृत्व नहीं

सड़क पर उतरे युवा = लोकतंत्र के लिए आत्ममंथन का समय

निष्कर्ष: क्या छोड़कर जाएंगे?

सड़कें जरूरी हैं, लेकिन शिक्षा उससे ज्यादा जरूरी है। एक्सप्रेसवे जरूरी हैं, लेकिन वर्ल्ड क्लास विश्वविद्यालय उससे ज्यादा जरूरी हैं।`

सरकारों को तय करना होगा - आने वाली पीढ़ियों के लिए `सड़कों का जाल` छोड़ना है या `ज्ञान की मजबूत नींव`।

क्योंकि `सड़कें देश को एक जगह से दूसरी जगह ले जाती हैं। शिक्षा देश को आगे ले जाती है।`

और अगर शिक्षा का बजट घटाकर सड़क बनाना ही "विकास" है, तो युवाओं का सवाल जायज है - `आखिर उनके भविष्य का बजट कौन बनाएगा?`

इस मुद्दे पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है सरकार को GDP का 6% शिक्षा पर खर्च करने का वादा पूरा करना चाहिए?

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