
Nari, Una:: श्रावण मास के प्रथम मंगलवार को जिला ऊना के नारी स्थित प्रसिद्ध डेरा बाबा रुद्रानंद आश्रम में पारंपरिक चूरी उत्सव श्रद्धा, भक्ति और धार्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। सुबह से ही आश्रम परिसर में श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो गया था। प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों के अलावा पड़ोसी राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस पावन अवसर पर आश्रम पहुंचे और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेकर सुख-समृद्धि की कामना की। पूरे आश्रम परिसर में भक्ति-भाव का वातावरण बना रहा।
आश्रम के महंत स्वामी हेमानंद महाराज के सान्निध्य में वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच सबसे पहले अखंड धूने की विधिवत पूजा-अर्चना की गई। इसके उपरांत आश्रम परिसर में स्थित पांच प्राचीन पीपल वृक्षों का धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजन किया गया। श्रद्धालुओं ने पूजा में भाग लेकर परिवार की खुशहाली, उत्तम स्वास्थ्य और समाज में शांति की प्रार्थना की। पूजा के बाद श्रद्धालुओं में प्रसाद वितरित किया गया तथा विशाल लंगर का आयोजन किया गया, जिसमें हजारों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।
आश्रम से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार लगभग पांच शताब्दी पूर्व इस पावन स्थल पर पांच योगी महात्माओं ने जीवित समाधि ली थी। यही कारण है कि यहां स्थित पांच पीपल वृक्षों को अत्यंत पवित्र और श्रद्धा का केंद्र माना जाता है। मान्यता है कि बाबा रुद्रानंद को उनके गुरु भवानी गिरि ने इस स्थान की आध्यात्मिक महत्ता से परिचित कराया था। इसके बाद यह स्थान साधना, तपस्या और धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया।
धार्मिक मान्यता यह भी है कि महाभारत काल में पांडव अपने वनवास के दौरान एक रात्रि के लिए इसी स्थान पर ठहरे थे। इसी कारण यह स्थल ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। वर्षों से चली आ रही परंपराओं का आज भी पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ पालन किया जाता है, जिससे इस प्राचीन धरोहर की धार्मिक गरिमा बनी हुई है।
परंपरा के अनुसार श्रावण मास के पहले मंगलवार को पांचों पीपल वृक्षों को घी, आटा और शक्कर से तैयार सवा मन चूरी का भोग अर्पित किया जाता है। इसके साथ ही भगवान ब्रह्मा को विशेष रूप से रोट तथा ढाई मीटर कपड़े का लंगोट अर्पित करने की परंपरा निभाई जाती है। श्रद्धालु पांचों पीपल वृक्षों के चारों ओर वस्त्र भी चढ़ाते हैं और उनकी परिक्रमा कर मनोकामनाएं मांगते हैं। मान्यता है कि सच्ची श्रद्धा से की गई प्रार्थना अवश्य फलित होती है।
चूरी उत्सव के दौरान पूरे आश्रम परिसर में भजन-कीर्तन और धार्मिक वातावरण बना रहा। स्वयंसेवकों ने श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए व्यवस्थाएं संभालीं, जिससे आयोजन शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न हुआ।
श्रद्धालुओं ने इस प्राचीन धार्मिक परंपरा को क्षेत्र की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत बताते हुए इसके संरक्षण और निरंतर आयोजन की आवश्यकता पर भी बल दिया।
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